Happy Father's Day

सख़्त अल्फ़ाज़ कहकर ,

वो रोया था छुपकर ।

कंधों से उतार कर ,

सिखाया चलना अपने पैरों पर ।

वही जो ऐब निकालता है अक़्सर ,

के हो वजूद मेरा जैसे बुलंद शजर ।

ऐसे सिखाता है अहम सबक-ए-सब्र ,

के भटकता है जस्तुजू-ए-परवरिश में दरबदर ।

सूरज हो तो है घना अम्बर ,

संभालता है कभी ख़ामोशी से ,

तो कभी ज़ोर से गरजकर ।

वक़्त रहते इस नेमत का करदो अदा शुक्र ,

सब खो चुके होंगे जब देखोगे पलटकर ।

वही जिसके जज़्बातों से रहे हम बेखबर ,

ए खुदा मेरे वालिद की करना दराज़ उमर ।

@SuvaibaZaheen

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