Kavita~3

एक अरसा हो गया वो नज़्म सुने

जो कहती थी चलो ख्वाब बुने

सब कह दूं , बस ये ना पूछो ,

जिनमें तुम नहीं कैसे वो पल चुने ?

बस खयाल तेरा अब रह गया

आसूंओं का वो दरिया बह गया

जो वक़्त कभी तुझ पर आके ठहरा ,

आज वो ही मुझे अजनबी कह गया ।

शामे यूं ही ढल जाती हैं

अब इनमें कोई साथ नहीं

चांद भी जिस रात को निखारे

उस रात में अब वो बात नहीं।

तो कभी आओ चलें एक यादों की बारात में

खुशनुमा ना सही तो गम के ही हालात में

कुछ फुरसत हो तुम्हें तो बस एक आवाज़ दे देना ,

दिन ना गुज़रे तो कुछ पल ही गुजारें साथ में ...

- Anjali Pandey

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