Shayari#01



दो नज़्म एक नग़मे की ज़ात,

मुझ ख़ाम को एक गुलबदन का साथ।

फ़ुरसत के फ़िरदौस के भी बख़्त में नहीं जो,

मेरे महबूब के अत्र में वो बीती रात। 

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