Shayari#01



दो नज़्म एक नग़मे की ज़ात,

मुझ ख़ाम को एक गुलबदन का साथ।

फ़ुरसत के फ़िरदौस के भी बख़्त में नहीं जो,

मेरे महबूब के अत्र में वो बीती रात। 

19 views0 comments

Recent Posts

See All

~

©2019 by Not Yet.