Shayari#02

एक महफूज़ सी ग़ज़ल की राग समझ के,

एक बीते लम्हे की इश्तियाक समझ के,

इस महफिल को खुदा की इरशाद समझ के

जो मैंने दो फूल फ़िरदौस के मांगे,

उसने भेजा तुझे ऐ हमसफ़र मेरी मोहब्बत समझ के।

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